Dharma Sangrah

श्री कृष्ण चालीसा Shri Krishna Chalisa

Webdunia
बुधवार, 24 नोव्हेंबर 2021 (08:47 IST)
॥ दोहा॥
बंशी शोभित कर मधुर,
नील जलद तन श्याम ।
अरुण अधर जनु बिम्बफल,
नयन कमल अभिराम ॥
 
पूर्ण इन्द्र, अरविन्द मुख,
पीताम्बर शुभ साज ।
जय मनमोहन मदन छवि,
कृष्णचन्द्र महाराज ॥
 
॥ चौपाई ॥
जय यदुनंदन जय जगवंदन ।
जय वसुदेव देवकी नन्दन ॥
 
जय यशुदा सुत नन्द दुलारे ।
जय प्रभु भक्तन के दृग तारे ॥
 
जय नटनागर, नाग नथइया |
कृष्ण कन्हइया धेनु चरइया ॥
 
पुनि नख पर प्रभु गिरिवर धारो ।
आओ दीनन कष्ट निवारो ॥4॥
 
वंशी मधुर अधर धरि टेरौ ।
होवे पूर्ण विनय यह मेरौ ॥
 
आओ हरि पुनि माखन चाखो ।
आज लाज भारत की राखो ॥
 
गोल कपोल, चिबुक अरुणारे ।
मृदु मुस्कान मोहिनी डारे ॥
 
राजित राजिव नयन विशाला ।
मोर मुकुट वैजन्तीमाला ॥8॥
 
कुंडल श्रवण, पीत पट आछे ।
कटि किंकिणी काछनी काछे ॥
 
नील जलज सुन्दर तनु सोहे ।
छबि लखि, सुर नर मुनिमन मोहे ॥
 
मस्तक तिलक, अलक घुँघराले ।
आओ कृष्ण बांसुरी वाले ॥
 
करि पय पान, पूतनहि तार्यो ।
अका बका कागासुर मार्यो ॥12॥
 
मधुवन जलत अगिन जब ज्वाला ।
भै शीतल लखतहिं नंदलाला ॥
 
सुरपति जब ब्रज चढ़्यो रिसाई ।
मूसर धार वारि वर्षाई ॥
 
लगत लगत व्रज चहन बहायो ।
गोवर्धन नख धारि बचायो ॥
 
लखि यसुदा मन भ्रम अधिकाई ।
मुख मंह चौदह भुवन दिखाई ॥16॥
 
दुष्ट कंस अति उधम मचायो ।
कोटि कमल जब फूल मंगायो ॥
 
नाथि कालियहिं तब तुम लीन्हें ।
चरण चिह्न दै निर्भय कीन्हें ॥
 
करि गोपिन संग रास विलासा ।
सबकी पूरण करी अभिलाषा ॥
 
केतिक महा असुर संहार्यो ।
कंसहि केस पकड़ि दै मार्यो ॥20॥
 
मातपिता की बन्दि छुड़ाई ।
उग्रसेन कहँ राज दिलाई ॥
 
महि से मृतक छहों सुत लायो ।
मातु देवकी शोक मिटायो ॥
 
भौमासुर मुर दैत्य संहारी ।
लाये षट दश सहसकुमारी ॥
 
दै भीमहिं तृण चीर सहारा ।
जरासिंधु राक्षस कहँ मारा ॥24॥
 
असुर बकासुर आदिक मार्यो ।
भक्तन के तब कष्ट निवार्यो ॥
 
दीन सुदामा के दुःख टार्यो ।
तंदुल तीन मूंठ मुख डार्य ॥

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